Vaidic Quotes
भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 48
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2.48।।
हे धनञ्जय तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।
By
being established in Yoga, O Dhananjaya (Arjuna), undertake actions,
casting off attachment and remaining eipoised in success and failure.
Eanimity is called Yoga.
वदन्तु शास्त्राणि यजन्तु देवान, कुर्वन्तु कर्माणि भजन्तु देवताः।
आत्मैक्य बोधेन विना, विमुक्ति: न सिध्यते ब्रह्मशतान्तरे अपि।।
भले
ही हम सौ बार ब्रह्मा की आयु जितने समय तक शास्त्रों के व्याख्यान करते
रहें, देवताओं की पूजा करते रहें, कर्मकांड करते रहें, देवताओं की भक्ति
करते रहें, परन्तु अगर हम अपने अंदर मौजूद परमात्मा को नहीं जान पाते,
हमें इन सभी से कभी भी मुक्ति नहीं मिल सकती। -विवेक चूड़ामणि





















