Saints' Words
सगुन ध्यान रुचि सरस नहिं निर्गुन मन ते दूरि।
तुलसी सुमिरहु राम को नाम सजीवन मूरि।।
यदि
कभी ऐसी स्थिति अा जाए कि देहस्वरूप (सगुण) के ध्यान में रस न आए और विदेह
(निर्गुण) मन की पहुंच से दूर हो, तो उस स्थिति में रामनाम के सुमिरन की
औषधि ही हमें नया जीवन प्रदान करती है।
05-07-2020
सतगुरु महिमा
भाई कोई सतगुरु सन्त कहावै जो नैनन अलख लखावै ।
द्वार न रूंधे पवन न रोकै, नहिं अनहद अरुझावै।
यह मन जाए जहाँ लग जबहिं, परमातम दरसावै ।
करम करै निःकरम रहै जो, ऐसी जुगत लखावै।
संत
सतगुरु उसे कहते हैं जो हमें अलख परमात्मा को दिखा देता है। वह हमें
इन्द्रियों को हठपूर्वक रोकने, प्राणायाम करने या अनहद शब्द सुनने में नहीं
उलझता। वह तो ऐसी युक्ति बताता है जिस से हमें जहां तक भी हमारा मन जा
सकता है वहां तक कण कण में परमात्मा नजर आने लगता है तथा हम कर्म करते हुए
भी निष्कर्म रह सकते हैं।
ਉਦਮੁ ਸੋਈ ਕਰਾਇ ਪ੍ਰਭ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
उदमु सोई कराइ प्रभ मिलि साधू गुण गाउ ॥
हे प्रभु ! मुझसे वही कार्य करवाओ जिससे मैं संतों से मिलकर तेरा गुणगान कर सकूं।
कबीरा जब पैदा हुए, जग हँसा हम रोये।
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये।।
जगत में कैसा नाता रे
मन फूला फूला फिरे, जगत में कैसा नाता रे।
चार जणा मिल गजी बनाई, चढ़ा काठ की घोड़ी ।
चार कोने आग लगाया, फूंक दियो जस होरी।।
हाड़ जरे जस लाकड़ी, केस जरे जस घासा।
सोना ऐसी काया जरि गई, कोइ न आयो पासा।।
- कबीर जी
नाम गरीबनिवाज को राज देत जन जानि।
तुलसी मन परिहरत नहिं घुर बिनिआ की बानि।।
दीनबंधु
प्रभु का नाम अपने भक्तों को परमधाम का राज्य प्रदान करता है, परंतु मन है
कि कूड़े के ढेर में पड़े दाने चुगने की आदत नहीं छोड़ता यानी गंदे विषयों
में ही सुख ढूंढता फिरता है।
ਮਾਹ ਦਿਵਸ ਮੂਰਤ ਭਲੇ ਜਿਸ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥
माह दिवस मूरत भले जिस कउ नदरि करे ॥
सारे महीने, दिवस एवं मुहूर्त उनके लिए भले हैं जिन पर प्रभु दया-दृष्टि करता है।
श्री आदि ग्रंथ, अंग 136
प्रीत पुरानी ना होत है, जो उत्तम से लाग।
सौ बरसा जल मैं रहे, पाथर ना छोरे आग।।
अच्छी तरह से किया गया प्रेम कभी भी पुराना नहीं होता। जैसे सौ वर्षो तक जल में रहने पर भी पत्थर से आग अलग नहीं होती।
कबीर जी
अब करिये सम्हार, मेरी नाव है मँझधार,
मैं दुखिया अति भार, तुम खेवट अगार हो॥
हम लखि लखहि हमार लखि हम हमार के बीच।
तुलसी अलखहि का लखहि राम नाम जप नीच।।
तू पहले स्वयं को जान, फिर ये जान कि असल में तेरा कौन है। उसके बाद यह जान कि तेरे और उस प्रभु के बीच में आने वाली अड़चन क्या है।
अरे
मूर्ख! इन तीनों को जाने बिना तू उस प्रभु को कैसे जान सकता है जो दिखाई
ही नहीं देता? उसको जानने का तरीका यही है कि तू रामनाम का जाप कर।
स्वारथ सुख सपनेहुं अगम परमारथ न प्रबेस।
राम नाम सुमिरत मिटहिं तुलसी कठिन कलेस।।
यदि
हमें सांसारिक सुख स्वप्न में भी नहीं मिलते और परमार्थ में तो प्रवेश ही
नहीं किया है, तो भी रामनाम का सुमिरन करने से हमारे सभी कठिन कलेश मिट
जाते हैं।
आतम चिन्ह परमातम चीन्है, संत कहावै सोई ।
यहै भेद काया से न्यारा, जानै बिरला कोई ॥
(कबीर जी)
जो
अपने आप की पहचान करके परमात्मा की पहचान कर लेता है, उसे ही संत कहते
हैं। यह रहस्य भौतिक नहीं है, इसलिए इसे कोई विरला ही जान पाता है।
तन नहिं तेरा धन नहिं तेरा, कहा रह्यो इहिं लागि।
दादू हरि बिन क्यों सुख सोवै, काहे न देखै जागि॥
- संत दादूदयाल जी
ना
ये शरीर तेरा है, ना धन। फिर भी पता नहीं क्यों तू इनमें रमा हुआ है ? तू
जाग्रत होकर क्यों विचार नहीं करता कि एक हरि के बिना और कहीं भी सच्चा
सुख नहीं मिल सकता।































