नवंबर 2020
30.11.2020
कायागढ भीतर देव देहुरा कासी।
सहज सुभाइ मिले अवनासी ।।
बदन्त गोरखनाथ सुणौ नर लोइ।
कायागढ जीतेगा बिरला नर कोई।।
गुरु गोरखनाथ जी कहते हैं कि शरीर रूपी किले के भीतर देवता, देवालय और काशी आदि सबकुछ है। इसमें सहज और स्वाभाविक रूप से परमात्मा से मिलाप हो सकता है। सभी लोग यह बात सुन लो कि कोई विरला मनुष्य ही इस काया रूपी किले पर विजय प्राप्त कर पाता है।
गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥
शिवजी कहते हैं - हे गिरिजा! संतों के सत्संग के समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। परन्तु वेद और पुराण कहते हैं कि सत्संग हरि कृपा के बिना नहीं प्राप्त हो सकता।
मल मल धोए शरीर को, धोए न मन का मैल।
नहाए गंगा गोमती, रहे बैल के बैल।।
तुम शरीर का मैल तो अच्छे से मल-मल कर साफ़ करते हो, किन्तु मन का मैल साफ़ नहीं करते। इसलिए तुम भले ही गंगा और गोमती जैसी नदियों में स्नान कर लो, परन्तु रहोगे मूर्ख के मूर्ख ही। अर्थात् पवित्र नदियों में नहा कर कोई भी अच्छा इंसान नहीं बन सकता, उसे शरीर के मैल के साथ-साथ मन का मैल भी साफ करना होगा।
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥
नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥
रामचरितमानस, उत्तरकांड
मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। सृष्टि में जितने भी जड़ - चेतन जीव हैं, वे सभी उसकी याचना करते हैं। मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है। कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति भी यही शरीर प्रदान कर सकता है।
जैसे तूफानों से टकराए बिना नाव की मजबूती का पता नहीं चलता उसी प्रकार बाधाओं को पार किए बिना प्रेम की दृढ़ता का भी पता नहीं चलता।
ਕਰਮੁ ਨ ਜਾਣਾ ਧਰਮੁ ਨ ਜਾਣਾ ਲੋਭੀ ਮਾਇਆਧਾਰੀ ॥
ਨਾਮੁ ਪਰਿਓ ਭਗਤੁ ਗੋਵਿੰਦ ਕਾ ਇਹ ਰਾਖਹੁ ਪੈਜ ਤੁਮਾਰੀ ॥
करमु न जाणा धरमु न जाणा लोभी माइआधारी ॥
नामु परिओ भगतु गोविंद का इह राखहु पैज तुमारी ॥
हे प्रभु ! मैं तो लोभ एवं माया का पुजारी हूँ, कोई शुभकर्म एवं धर्म नहीं जानता। मेरा नाम गोविन्द का भक्त पड़ गया है, अतः आप ही अपने नाम की लाज रखो।
- गुरु अर्जुन देव जी
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा।
तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥
जब आंतरिक आत्मिक अनुभव का सुख और सुंदर प्रकाश प्रकट होता है, तब आवागमन के मूल भेद यानी भ्रम का नाश होता है।
-रामचरितमान, उत्तरकांड
यदि हमारी दृष्टि चोटी पर स्थित लक्ष्य पर टिकी हुई हो तो हमें पांवों की थकान का एहसास ही नहीं होता।
मोको कहां ढूँढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में।
ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकान्त निवास में।
ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना काबे कैलास में।।
खोजि होय तुरत मिल जाउं, इक पल की तालास में।
कहत कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूं विश्वास में।।
-संत कबीर जी
भगति करत बिनु जतन प्रयासा।
संसृति मूल अबिद्या नासा
॥
भजन करते हुए जन्म- मृत्यु के चक्र की जड़ माया बिना ही प्रयत्न और प्रयास के अपने आप नष्ट हो जाती है।
रामचरतमानस, उत्तरकांड
दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥
यदि तू अपने अंतर में और बाहरी सांसारिक जीवन में - दोनों ओर उजाला चाहता है, तो अपनी जीभ की दहलीज पर रामनाम रूपी मणियों का दीपक स्थापित कर।
निमिष दंड भरि एकउ बारा।
सतसंगति दुर्लभ संसारा।।
इस संसार में एक पल या एक घड़ी भर का या एक बार का सत्संग भी दुर्लभ है।
किसी जंगली जानवर की तुलना में कपटी और दुष्ट मित्र से ज्यादा डरना चाहिए। क्योंकि जानवर तो बस शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, पर एक बुरा मित्र बद्धि को नुकसान पहुंचता है।
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।
करनधार बिनु जिमि जलजानू॥
राम के प्रेम के बिना ज्ञान भी उसी प्रकार शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधार के बिना जहाज।
सुखी मीन जे नीर अगाधा।
जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।
जैसे गहरे पानी में चले जाने पर मछलियां सुखी हो जाती हैं, उसी प्रकार हरि की शरण में चले जाने पर जीव को एक भी कष्ट नहीं रहता।
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी॥
माया के वशीभूत होकर जड़ शरीर व मन तथा चेतन आत्मा में गाँठ पड़ गई है। यद्यपि यह बंधन एक छलावा ही है, फिर भी यह कठिनता से ही छूट पाता है। जब से जीव इस बंधन में पड़ा है तभी से वह संसार में जन्मने- मरने वाला बन गया है। अब न तो यह गाँठ छूटती है और न ही वह सुखी हो पाता है।
अनुशासनहीन मन से अधिक उद्दंड और कुछ नहीं है, जबकि अनुशासित मन से अधिक आज्ञाकारी और कुछ नहीं है।


















