अक्टूबर 2020
🌸30-10-2020🌸
🙏सुप्रभात🙏
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।।
हे गुरुदेव, मैं आपके चरण कमलों की वंदना करता हूँ। आप दया के सागर और मनुष्य के रूप में स्वयं परमात्मा हो। आपके वचन मोह के घने अंधकार को समाप्त करने के लिए सूर्य की किरणों के समान हैं।
गीता 6:8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥
परमात्मा से मिलाप कर चुके व्यक्ति की आत्मा ज्ञान-विज्ञान से तृप्त होती है, वह सभी प्रकार के विकारों से ऊपर उठा हुआ होता है, उसकी इन्द्रियाँ पूरी तरह से उसके वश में होती हैं और उसके लिए मिट्टी, पत्थर व सोना समान होते हैं।
सादर सुमिरन जे नर करहीं।
भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥
जो मनुष्य आदरपूर्वक नाम का सुमिरन करते हैं, वे संसार रूपी सागर को गाय के खुर से बने हुए गड्ढे के समान आसानी से पार कर जाते हैं।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।
ताहि भजन तजि भाव न आना।।
प्रभु के स्वभाव को जो जान जाता है, उसको भजन के सिवाय और कुछ अच्छा नहीं लगता।
तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता ॥
तूं मेरा बंधपु तूं मेरा भ्राता ॥
तूं मेरा राखा सभनी थाई ता भउ केहा काड़ा जीउ ॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा।मोतें संत अधिक करि लेखा।।
प्रभु राम शबरी को नवधा भक्ति का सातवां अंग समझाते हुए कहते हैं: भक्त को चाहिए कि वह ऐसा माने कि प्रभु सारे संसार में रमा हुआ है, लेकिन वर्तमान अवस्था में उसके लिए प्रभु से भी महत्वपूर्ण संत हैं। - अरण्य काण्ड
मूर्खों के साथ बहस करना अपने गाल पर बैठे मच्छर को मारने की तरह है। चाहे हम उसे मारने में कामयाब हों या ना हों, मगर हर हाल में चपत तो हम अपने आप को ही मारते हैं।
सब धरती कागद करूं, लेखनि सब वनराय ।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय ।।
अगर मैं इस पूरी धरती को ही कागज बना लूं, पृथ्वी के सभी वृक्षों की कलम और सातों समुद्रों के पानी की स्याही बना लूं। इन सबसे भी यदि मैं अपने गुरु के गुणों को लिखना चाहूं, तो भी नहीं लिख पाऊंगा, क्योंंकि वे अनंत हैं।
अतीत को याद रखना अच्छी बात है, मगर हर वक्त उसके बारे में पछतावा ही करते रहने से कुछ प्राप्त नहीं होगा। हमारा अतीत हमारे भविष्य की उड़ान के लिए जंजीर नहीं बनना चाहिए।
आगे देखिए, आगे बढ़िये, तभी मंजिल मिलेगी।
निज प्रभुमय देखहिं जगत् केहि सन करहिं बिरोध॥
राम के चरणों के प्रेमी काम, अभिमान तथा क्रोध से रहित होते हैं। ऐसे लोग अपने प्रभु को सारे जगत में ही रमा हुआ देखते हैं, फिर वे किसी से वैर कैसे कर सकते हैं?
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।
कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥
संत, कवि, विद्वान तथा वेद, पुराण आदि सभी सद्ग्रंथ यही कहते हैं कि संतों का सत्संग जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होने का और कामियों का संग भवसागर में पड़ने का मार्ग है।
मनुष्य और प्रभु के बीच में सबसे बड़ा और मोटा परदा अहंकार है – रूमी
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥
हे प्रभु ! आपके नाम का सुमिरन करने से सारे पाप, प्रपंच और समस्त अमंगलों के समूह मिट जाते हैं तथा इस लोक में सुंदर यश और परलोक में सुख प्राप्त होता है।
नेह निबाहन कठिन है, सबसे निबहत नाहि।
चढ़बो मोमे तुरंग पर, चलबो पावक माहि।।
प्रेम का निर्वाह अत्यंत कठिन है। इसको सब नहीं निभा सकते। उसी प्रकार जैसे मोम के घोड़े पर चढ़कर आग के बीच चलना असंभव होता है।
मैं जानता हूं कि मुझमें सफल होने की क्षमता नहीं है, ये सिर्फ तेरी विशेषता है कि तू मुझे असफल नहीं होने देता।
ਦਇਆ ਦਇਆ ਕਰਿ ਰਾਖਹੁ ਹਰਿ ਜੀਉ ਹਮ ਦੀਨ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਇ ॥
ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਤੁਮ ਪਿਤਾ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਜਨ ਨਾਨਕ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇ ॥
दइआ दइआ करि राखहु हरि जीउ हम दीन तेरी सरणाइ ॥
हम बारिक तुम पिता प्रभ मेरे जन नानक बखसि मिलाइ ॥
हे प्रभु ! हम दीन तेरी शरण में आए हैं, दया करके हमारी रक्षा करो। तुम हमारे पिता हो और हम तेरी संतान हैं, हमें क्षमा करके अपने साथ मिला लो।
(गुरु रामदास जी, आदि ग्रंथ अंग 881)


















