सितंबर 2020
30-09-2020
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला।
मिटी मलिन मन कलपित सूला॥
गुरु के प्रसन्न होने पर कुल मालिक भी अनुकूल हो जाता है तथा मलिन मन के द्वारा पैदा किए गए कष्ट मिट जाते हैं।
कबीर सो धन संचिए जो आगे कूं होइ।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ ॥
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही।
हारेहूँ खेल जितावहिं मोही॥
मैंने प्रभु के कृपा करने के तरीके को समझ लिया है- जब मैं हार जाता हूं, वे तब भी मुझे जिता देते हैं।
जेहि जन पर ममता अति छोहू।
जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥
प्रभु की अपने भक्तों पर बड़ी ममता और प्रेम है। उन्होंने एक बार जिस पर कृपा कर दी, उस पर फिर कभी क्रोध नहीं करते।
लोग कोई संकट आने पर डरने और घबराने में जितनी शक्ति नष्ट करते हैं, उसकी आधी भी यदि उस संकट से निपटने का उपाय सोचने के लिए लगाये तो आधा संकट तो अपने आप ही टल सकता है।
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
इस जगत में चौरासी लाख योनियों में जो अनेक प्रकार के जीव जल, पृथ्वी और आकाश में रहते हैं, उन सब में सीता (आत्मा) और राम (परमात्मा) विद्यमान हैं। इसलिए मैं दोनों हाथ जोड़कर सभी को प्रणाम करता हूँ।
सोई सोई नाच नचाइए, जेहि निबहे गुरु प्रेम।
कहै कबीर गुरु प्रेम बिन, कतहुं कुशल नहीं क्षेम।।
अपने मन और इन्द्रियों को उसी चाल में चलाओ जिससे गुरु के प्रति प्रेम बढ़ता जाए। क्योंकि गुरु के प्रेम के बिना कहीं कुशल क्षेम नहीं।
देह रहे संसार में, जीव राम के पास।
दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख साल।।
यदि इस संसार में रहते हुए भी हमारी लिव हरदम प्रभु में लगी रहे, तो हम पर काल के कष्टों, दुखों और यातनाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ा सकता।
'कबीर’ सिरजनहार बिन, मेरा हितू न कोइ ।
गुण औगुण बिहड़ै नहीं, स्वारथ बंधी लोइ ॥
एक सिरजनहार के अलावा मेरा और कोई शुभचिंतक नहीं है। मुझ में गुण हो या अवगुण, वह कभी मुझे छोड़ कर नहीं जाता, जबकि सारी दुनिया तो केवल स्वार्थ के कारण हमसे बंधी हुई है।
रामचरितमानस का संदेश
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।
हे भाई ! कोई किसी को सुख या दुख नहीं देता, सब अपने ही किए कर्मों का फल भोगते हैं।
जगत में झूठी देखी प्रीत
एक विचार लो। उस विचार को अपना जीवन बना लो, उसके बारे में सोचो, उसके सपने देखो, उस विचार को जियो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो और बाकी सभी विचारों को किनारे रख दो। यही सफ़ल होने का तरीका है। - स्वामी विवेकानन्द
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ।
रात को सोते हुए गँवा दिया और दिन खाते खाते गँवा दिया। इस प्रकार ये हीरे जैसा अनमोल जीवन कोड़ियों के बदलेे व्यर्थ जा रहा है।























