जुलाई 2020


बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न तव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥

जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाए और बालू को पेरने से भले ही तेल निकल जाए, परंतु हरि के भजन के बिना संसार सागर  से नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धांत अटल है।

किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ।
जे करि साहिब मनहु न वीसरै, ता सहिला मरणा होइ ॥
हम नहीं जानते कि हमारी मृत्यु किस प्रकार होगी ? लेकिन यदि मरते समय मालिक न भूले, उसका सुमिरन याद रहे, तो मरना आसान हो जाता है।
कबीर, आदि ग्रंथ, अंग ५५५


 ध्रिग जीवन देव सरीर हरे। 
तव भक्ति बिना भव भूलि परे।। 
हे प्रभु ! देवताओं के शरीर और जीवन को धिक्कार है, क्योंकि वे आपकी भक्ति के बिना चौरासी के चक्र में भूले हुए फंसे रहते हैं।।
- रामचरितमानस: ब्रह्मा द्वारा श्रीराम की स्तुति



जिस दिन आपके सामने कोई समस्या ना आए, समझ लें कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।


मुद मंगलमय संत समाजू। 

जो जग जंगम तीरथराजू॥

संतों का सत्संग सच्चा आनंद  प्रदान करता है, हमारा  कल्याण करता है। यह जगत में चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग है।

रामचरिमानस, बालकाण्ड



बेष बिषद बोलनि मधुर मन कटु करम मलीन।

तुलसी राम न पाइऐ भएँ बिषय जल मीन।।

दिखावे के लिए सुंदर वस्त्र पहनते हैं, बड़ा मीठा बोलते हैं लेकिन में में कपट भरा हुआ है, कर्म हमेशा मैले ही करते हैं, मन विषय भोगों के जल में मछली कि तरह रमा हुआ है - 

याद रखें ऐसे तो वह प्रभु राम कभी नहीं मिल सकता। 


भगवद् गीता अध्याय 11 श्लोक 37

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्ग गरीयसेब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।

अनन्त देवेश जगन्निवासत्व मक्षरं सदसत्तत्परं यत्।।

हे गुरुओं के भी गुरु, सारी सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्माजी को भी पैदा करने वाले   महात्मा ! आपको नमस्कार क्यों न करें ? क्योंकि आपका अंत कोई नहीं पा सकता, सारे देवता भी आपके अधीन हैं, सम्पूर्ण जगत में आपका ही निवास है, आप अक्षर (शब्द) स्वरूप  हैं । आप सत् भी हैं, असत् भी हैं और इस से परे भी आप ही हैं।

हमारा जीवन कितना सार्थक है, इसकी पहचान यही है कि हम अपने कर्तव्य के प्रति कितने ईमानदार हैं।  


गुरु के बचन प्रतीति न जेही।

सपनेहु सुलभ न सुख सिधि तेही।।

जिसे अपने गुरु के वचनों पर भरोसा नहीं है, उसे सपने में भी सुख और सफलता नहीं मिल सकती। 

रामचरितमानस


जे तू अकल लतीफ काले लिख न लेख ॥

आपनड़े गिरीवान मह सिर नींवां कर देख ॥

यदि तू बुद्धिमान है तो काली करतूतों के लेख लिखता ही मत रह, बल्कि विनम्रताूर्वक अपने गिरेबान में झांक कर देख कि जो काम तू कर रहा है वो कहां तक सही हैं।
- शेख फरीद 



एक मूरति अनेक दरसन कीन रूप अनेक॥
खेल खेल अखेल खेलन अंत को फिर एक॥ 
वह एक प्रभु ही संसार में अनेक  रूपों में अनेक प्रकार से दिखाई देता है। वह जगत की रचना का नाटक खेलता है और अंत में इस नाटक  को समेट कर फिर से अनेक से एक हो जाता है। 
जाप साहिब, गुरु गोविन्द सिंह जी



राम नाम कलि कामतरु राम भगति सुरधेनु।
सकल सुमंगल मूल जग गुरुपद पंकज रेनु।।
                        - गोस्वामी तुलसीदास जी
कलियुग में राम-नाम ही मनचाहा फल प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष है, राम-भक्ति ही मनचाही वस्तु प्रदान करने वाली कामधेनु है और सतगुरु के चरणकमल की धूलि ही संसार में सब प्रकार से कल्याण की जड़ है।